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बाल गंगाधर तिलक की जीवनी - Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi

बाल गंगाधर तिलक की जीवनी - Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi

                                                                           
भारतीय राष्ट्रीय भावना के अग्रदूत लोकमान्य बाल गंगाधर (Bal Gangadhar Tilak) ने ही घोषणा की थी कि “स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मै उसे लेकर रहूँगा ” | इसी उद्देश्य की प्राप्ति के वे जीवन भर संघर्ष करते रहे | बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी नामक स्थान पर एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था | उनके पिता गंगाधर शास्त्री संस्कृत के विद्वान थे | उन्होंने अपने पुत्र को घर पर संस्कृत की शिक्षा दी |
बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) 1879 में B.A.LLB करके कॉलेज से बाहर निकले | उनके सामने सरकारी नौकरी के अनेक प्रलोभन थे पर उन्होंने अपने कुछ सहयोगियो को साथ लेकर न्यू इंग्लिश स्कूल खोला और इस प्रकार नई पीढ़ी को भविष्य के लिए तैयार करने के लक्ष्य के साथ सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया | फिर “दक्कन एजुकेशन सोसाइटी” और 1885 में फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की | पर विचार-भेद के कारण तिलक (Bal Gangadhar Tilak) 1890 में इस सोसाइटी से अलग हो गये और 1881 से शुरू हुए “मराठा” (अंग्रेजी) और “केसरी” (मराठी) पत्रों का सम्पादन तथा प्रकाशन का काम अपने हाथ में ले लिया |
तिलक (Bal Gangadhar Tilak) ने इन पत्रों के माध्यम से जन-जागरण का काम आगे बढाया | गणेश पूजा ,शिवाजी जयंती और कीर्तन मंडलियो को नया रूप दिया , व्यायाम शालाये खोली और इन्हें राष्ट्रीय भावना के प्रसार का माध्यम बनाया | विदेशी शासको के अत्याचारों के विरोध का ही प्रभाव था कि चापेकर बंधुओ ने प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या कर दी और तिलक को भी इस मामले में जेल की सजा हुयी | तिलक (Bal Gangadhar Tilak) कांग्रेस संघठन से भी जुड़े हुए थे पर वे आवेदन पत्रों की नरम दल नीतियों की आलोचना करते थे | उनका झुकाव क्रांतिकारी विचारों की ओर था |
पंजाब के लाला लाजपत राय और बंगाल के विपिन चन्द्र पाल से उनका विचार साम्य था इसलिए इन तीनो की तिकड़ी “लाल-बाल-पाल” 20वी सदी के दुसरे दशक तक भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की ज्योतिशिखा मानी जाती थी | फिर भी नरम विचारों के कांग्रेस जन तिलक को सह नही सके और 1907 की सुरत कांग्रेस में उनका संघठन में प्रवेश रोक दिया गया | सरकार ऐसे अवसर की ताक में थी | तिलक गिरफ्तार (Bal Gangadhar Tilak) करके म्यांमार (बर्मा) के मांडले जेल में बंद कर दिए गये |
6 वर्ष की अवधि पुरी करके वे जेल से ओर भी दृढ़ विचार लेकर बाहर आये | उन्होंने “होमरूल लीग” की स्थापना की और देश-भर में उसका प्रचार किया | अब उनका इतना प्रभाव पड़ा कि 1916 में लखनऊ में पुरी कांग्रेस उनके साथ हो गयी | तिलक ने देश के आन्दोलन की जो भूमि तैयार की थी , गांधीजी ने उसी को अपने आगे की आन्दोलन का आधार बनाया | लेकिन विडम्बना देखिये कि गांधीजी का आन्दोलन 1 अगस्त 1920 को आरम्भ होने वाला था और उसी दिन 31 जुलाई और 1 अगस्त 1920 की रात के 12 बजकर 40 मिनट पर तिलक ने सदा के लिए आँखे बंद कर ली | गांधीजी ने उस अवसर पर कहा था “मेरी ढाल मुझसे छीन गयी”
तिलक (Bal Gangadhar Tilak) महान राष्ट्रीय योद्धा के साथ साथ महान विद्वान भी थे | उनकी तीन पुस्तके बहुत प्रसिद्ध है – 1893 में प्रकाशित “ओरियन” पुस्तक में 5000 वर्ष पूर्व के वैदिक काल का वर्णन है | 1903 में प्रकाशित “The Arctic Home in the Vedas” में आर्यों के आदिदेश पर प्रकाश डाला गया है | मांडले जेल में 1911 में लिखी और 1915 में प्रकाशित “गीता रहस्य” में गीता का प्रवृति मुलक मार्ग परिभाषित किया गया है |

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