Aatmagyan
आत्मज्ञान , Aatmagyan , Enlightenment
आत्मज्ञान की इच्छा करने वालों को स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि जो अनावश्यक जान पड़ती हों, कम-से-कम उन कामनाओं का तो परित्याग करना ही पड़ता है। अपनी बुद्धि को यथासंभव एकाग्र और निर्मल बनाने की वैसी ही आवश्यकता होती है, जिस प्रकार भरे हुए जल में प्रतिबिंब देखने के लिए लहरों को रोकना आवश्यक होता है।
कामनाएँ एक प्रकार की लहरें ही होती हैं, जिनके रहते हुए आत्मा का प्रतिबिंब साफ नहीं झलकता। इस बात का पक्का और पूर्ण विश्वास हो जाने पर आत्मा स्वयं अपना गुरु, नेता या मार्गदर्शक हो जाता है। सभी सदाचरण स्वतः उसमें प्रकट होने लगते हैं। वह स्वयं ही सत्य और शुद्ध चरित्रमय बनने लगता है।
भय और लोभ आत्मविकास के मार्ग में निरंतर बाधाएँ पहुँचाते रहते हैं। बहिर्मुखी इंद्रियाँ भी चैन से नहीं बैठने देतीं। अंतरात्मा को देखने की दिव्यदृष्टि थोड़ी देर के लिए जाग्रत होती है। अधिकांश समय ये इंद्रियाँ तरह-तरह के बाहरी प्रलोभनों की ओर ही आकर्षित होती रहती हैं। अच्छे-अच्छे स्वादयुक्त भोज्य पदार्थ, अधिक धन, विपुल ऐश्वर्य, कुच और कंचन की अतृप्त तृष्णा बार-बार अंतर्मुखी इंद्रियों को बहकाती रहती है। अज्ञानी लोग बाह्य विषयों के प्रलोभनों में फँस जाते हैं। (आत्मज्ञान , Aatmagyan , Enlightenment)
इसीलिए बताया गया है कि यह मार्ग अति कठिन है, उससे पार जाना कोई आसान काम नहीं है। अमृतत्व की तीव्र आकांक्षा रखने वाले साहसी पुरुष इंद्रियों की क्षणिक लोलुपता और मन के विद्रोह के आगे नहीं झुकते। वे निष्ठाभाव से आध्यात्मिक विकास की साधना में संलग्न रहते हैं और आत्मज्ञान का लाभ प्राप्त करते हैं। यह मार्ग कायरों के लिए कठिन, परपुरुषार्थियों के लिए सरल होता है। वे इन कठिनाइयों में भी अपने जीवन का आनंद ढूँढ़ लेते हैं और अंत तक तत्परतापूर्वक अभ्यास करते हैं। यह आत्मा अंत में उन्हीं वीर पुरुषों को प्राप्त होता है। वही मुक्ति के अधिकारी होते हैं।
(आत्मज्ञान , Aatmagyan , Enlightenment)